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Friday, December 8, 2023

सफ़र: एक नज़्म

आह का असर होता नहीं, ये दर्द इस कदर हद से गुजरा है।
परछाई भी मुझे छू न पाए, वो इस तरह मेरे पास से गुजरा है।।

इक तबस्सुम आई थी उसके होठों पर कुछ पल के लिए
ताजा रोटी का मंजर शायद उसकी आँख से होकर गुजरा है।।

चेहरे पर बनी लकीरों के निशां ये बताने के लिए काफी है
सफर मेरी जिंदगी का, न जाने कहाँ-कहाँ से होकर गुजरा है।।

तुम्हारा तबस्सुम जो तुम्हारे होठों से गुजर कर आंखों में जाकर ठहरा
उसका सफर मेरे दिल, मेरी साँसों पर कयामत बन कर गुजरा है।।
-© जितेन्द्र नाथ  
9/12/2023




Saturday, November 25, 2023

The Railway Men: Poetry of Pain

द रेलवे मैन :  सत्य घटनाओं पर आधारित दारुण कथा
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भारत में वेब सीरीज की जमीन गाली गलौज की दुनिया से आगे बढ़ कर अपने लिए एक पुख्ता जमीन तलाश करने में सक्षम हो गई है। 'द रेलवे मैन' इस बात का सुंदर उदाहरण है। किसी अपराधिक पृष्ठभूमि के गुनाहगारों को 'लार्जर देन लाइफ' साबित करने वाली कहानियों के अलावा भी कुछ बनाया जा सकता है, यह इस सीरीज ने साबित कर दिया है।
भोपाल गैस त्रासदी की दारुण त्रासदी पर एक धाराप्रवाह करुणामयी कविता की तरह चलती है इस सीरीज की कहानी। The Railway Men में दिखाया गया है कि कुछ कंपनियां अपने लालच के लिए किस तरह से आम इंसानों को मौत के दावानल में धकेल देती हैं। इस सीरीज में  लगभग सभी कलाकारों का काम बेहतरीन है।
 शुरुआती एपिसोड में दिव्येन्दु भट्टाचार्य है जो कमरुद्दीन की भूमिका में है। मैंने यह अभिनेता जामताड़ा सीरियल में काम करते हुए पहली बार महसूस किया। देखा तो उन्हें शायद पहले भी हो सकता है पर जहन में उस सीरियल के बाद अटके। उनका अभिनय इस सीरीज की जानदार शरुआत करता है।
बाबिल खान, जो इरफान के पुत्र हैं, का अभिनय की दुनिया में यह पहला कदम है। इस सीरीज में उनका पहला सीन कौन सा शूट हुआ होगा, इस बात का हमें पता नहीं लेकिन शुरुआती सीन में अपरिपक्वता झलकती है। शायद इसका कारण यह भी हो सकता है कि मैंने शुरू में उनमें इरफान को ढूंढने की कोशिश की हो। बाबिल को इस चीज का मुकाबला करना होगा। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, बाबिल खान अपने आप को बड़ी खूबसूरती से इमाद के किरदार में ढाल लेते हैं। इमाद के एक डॉयलोग में जब वह कहते हैं कि 'यह मेरी बस्ती है... तो ऐसा लगता है कि जैसे वो माया नगरी में अपने आने का एलान कर रहे हों। मुझे संजय खान के बनाये सीरियल 'ग्रेट मराठा' में इरफान का एक सीन याद आता है जिसमें इरफान (ग़ुलाम कादिर- अहमद शाह अब्दाली का सेनापति) और मुकेश खन्ना (इब्राहिम खान गार्दी- मराठों का तोपची) आमने सामने होते हैं। मुकेश खन्ना उस वक्त अपनी लाउड एक्टिंग से सामने वाले अभिनेता पर हावी हो जाते थे। उस सीन में भी मुकेश खन्ना के बड़े अच्छे लिखे डायलॉग हैं जो दर्शकों को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त थे पर जब उनके डायलॉग खत्म होते हैं तो छरहरे शरीर पर सेनापति का भारी भरकम लबादा पहने, उकताए हुए, सिर्फ इतना कहते हैं... इसे तोप से उड़ा दो। उस डायलॉग में कोई खास कारीगरी नहीं थी पर एक अभिनय के कारीगर ने उसे इतनी बारीकी से बोला था जिसमें सब कुछ था... गुस्सा, खीज और क्रूरता। उम्मीद है कि बाबिल इस अभिनय की बस्ती को अपनी दुनिया बनाएंगे और लंबे समय तक टिकेंगे।
द रेलवे मैन : के के मेनन/आर माधवन/दिव्येन्दु (2) 
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अगर कहानी में जान हो तो ठीक ठाक अभिनेता भी काम चला जाते हैं और एक अच्छा अभिनेता/अभिनेत्री औसत कहानी का स्तर उठा देते हैं। अगर कहानी भी कसी हुई हो और उसमें के के मेनन, आर माधवन और दिव्येन्दु जैसे धरती-पकड़ अभिनेता काम कर रहे हों तो जो नतीजा सामने आता है वह है 'रेलवे मैन'। 
'रेलवे मैन' की कहानी भारतीय जनमानस में गहरे पैठी हुई भोपाल गैस कांड की जन-त्रासदी के इर्द-गिर्द घूमती है और इसी घटना का एक अहम किरदार बन जाता है भोपाल का रेलवे स्टेशन।
रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर की भूमिका के के मेनन ने निभाई है। यह अभिनेता अब अभिनय की पाठशाला बन गया है। वे अपने जीवन की एक विफलता की आत्मग्लानि से ग्रसित एक कर्त्तव्य परायण स्टेशन मास्टर इफ्तिखार सिद्दीकी की भूमिका की आत्मा में बहुत गहरे तक उतर गए हैं। उनकी बेबसी, बेचैनी, दुख और त्रासदी में लोगों को बचाने में विफलता के सारे भाव  दर्शकों तक बखूबी पहुंचते हैं। शुरुआत में अपने स्टेशन की संचार-तंत्र को ठीक करवाने के लिए जूझते हुए स्टेशन मास्टर इफ्तिखार सिद्दीकी को आगे चलकर जिंदगी और मौत के बीच संवाद कायम करना पड़ता है। के के मेनन ने लाचार व्यवस्था के बीच अपने साधनों को साधने की  अदाकारी को जीवंत कर दिया है। यूँ तो पूरा किरदार ही बहुआयामी है लेकिन कुछ सीन लाजवाब बन पड़े हैं। एक सीन है जिसमें वह आने वाली ट्रेन को रोकने की सूचना देना चाहते हैं लेकिन टेलीफोन काम नहीं कर रहा है। इस सीन में उनकी बेचारगी देखते ही बनती है। अंतिम सीन में जहां वे मुर्दा लोगों के बीच एक लाश के रूप में पड़े हुए हैं लेकिन अंतिम संस्कार से पहले उनके जीवन की ज्योति फिर टिमटिमा उठती है और वे बदहवासी में फिर से लोगों को बचाने की गुहार लगाते हैं। यह सीन अगर कोई दूसरा अभिनेता करता तो एक ट्रैजिक तो एक ट्रैजिक सीन कॉमेडी सीन में परिवर्तित हो सकता था लेकिन यह केके मेनन की ही महारत है कि वे अपने दर्शकों को इस दारुण दृश्य में शामिल कर लेते हैं और दर्शक भी सामने जलती हुई चिताओं को देखकर शोक संतृप्त हो जाते हैं। मनोज बाजपेई ही यह कैसे सक्षम अभिनेता थे जो इसे इतनी ही शिद्दत से निभाने में सक्षम है। यदि कभी भविष्य में अभिनय की बात की जाएगी तो अवश्य ही यह सीन बलराज साहनी, संजीव कुमार, और पंकज कपूर जैसा अभीनेताओं के उदाहरण के साथ उद्धरित किया जा सकेगा
दिव्येन्दु यहां पर बलवंत यादव नामक लुटेरे की भूमिका में है जो स्टेशन की तिजोरी से करोड़ों रुपए लूटने की फिराक में है लेकिन कॉन्स्टेबल की वर्दी पहने वह इफ्तिखार सिद्दीकी के साथ लोगों को बचाने की मुहिम में न चाहते हुए भी शामिल हो जाता है। एक चोर के भीतर चलते हुए लालच और इंसानियत के द्वंद्व को उन्होंने बखूबी साकार किया है। मिर्ज़ापुर से चर्चित हुआ यह अभिनेता यकीनन एक मंझे हुए एक्टर में परिवर्तित हो चुका है।
आर माधवन एक लवर बॉय से एक शानदार गरिमामय अभिनेता में ढल चुके हैं। यहाँ पर उनका किरदार बहुआयामी तो नहीं है पर एक व्यवस्था को नकार कर अपना धर्म निभाने वाले जी एम की भूमिका में वह जमे हैं।
यश चोपड़ा की धरोहर संभाले हुए आदित्य चोपड़ा और उदय चोपड़ा की सारगर्भित प्रस्तुति को निर्देशक शिव रवैल ने बड़ी खूबसूरत अंदाज़ में भोपाल को ओटीटी के पर्दे पर साकार कर दिया है।
कुछ अच्छा देखना चाहते हैं तो रेलवे मैन एक बढ़िया चुनाव रहेगा।

Tuesday, July 25, 2023

Chausar: Review: Rajiv Taneja

उपन्यास : चौसर

लेखक: जितेन्द्र नाथ

समीक्षक: राजीव तनेजा

राजीव तनेजा जी और चौसर


 थ्रिलर उपन्यासों का मैं शुरू से ही दीवाना रहा हूँ। बचपन में वेदप्रकाश शर्मा के उपन्यासों से इस क़दर दीवाना बनाया की उनका लिखा 250-300 पेज तक का उपन्यास एक या दो सिटिंग में ही पूरा पढ़ कर फ़िर अगले उपन्यास की खोज में लग जाया करता था। इसके बाद हिंदी से नाता इस कदर टूटा कि अगले 25-26 साल तक कुछ भी नहीं पढ़ पाया। 2015-16 या इससे कुछ पहले न्यूज़ हंट एप के ज़रिए उपन्यास का डिजिटल वर्ज़न ख़रीद कर फ़िर से वेदप्रकाश शर्मा जी का लिखा पढ़ने को मिला। उसके बाद थ्रिलर उपन्यासों के बेताज बादशाह सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के लेखन ने ऐसा दीवाना बनाया कि 2020 के बाद से मैं उनके लगभग 100 उपन्यास पढ़ चुका हूँ। इस बीच कुछ नए लेखकों के थ्रिलर उपन्यास भी पढ़ने को मिले। आज उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए मैं एक ऐसे तेज़ रफ़्तार थ्रिलर उपन्यास 'चौसर' का यहाँ जिक्र करने जा रहा हूँ जिसे अपनी प्रभावी कलाम से लिखा है जितेन्द्र नाथ ने। 


इस उपन्यास के मूल में कहानी है कॉन्फ्रेंस पर मुंबई आए हुए विस्टा टेक्नोलॉजी के पंद्रह एम्प्लॉईज़ के अपने होटल में वापिस ना पहुँच एक साथ ग़ायब हो जाने की। जिसकी वजह से मुम्बई पुलिस से ले कर दिल्ली तक के राजनैतिक गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है। अहम बात यह कि उन पंद्रह इम्प्लाईज़ में से एक उत्तर प्रदेश के उस बाहुबली नेता का बेटा है जिसकी पार्टी के समर्थन पर केंद्र और राज्य की सरकार टिकी हुई है। इंटेलिजेंस और पुलिस की विफलता के बाद बेटे की सुरक्षित वापसी को ले कर चल रही तनातनी उस वक्त अपने चरम पर पहुँचने लगती है जब इसकी वजह से सरकार के अस्तित्व पर ख़तरा मंडराने लगता है। 


इसी उपन्यास में कहीं किसी बड़े राजनीतिज्ञ के बेटे के अपहरण की वजह से राजनीतिक गलियारों में चल रही सुगबुगाहट बड़ी हलचल में तब्दील होती नज़र आती है। तो कहीं अपहर्ताओं को पकड़ने में हो रही देरी की वजह से सरकार चौतरफ़ा घिरती नज़र आती है कि उसके वजूद पर ही संकट मंडराता मंडराने लगता है। इसी किताब में कहीं कोई संकटमोचक बन कर सरकार बचाने की कवायद करता नज़र आता है तो कहीं कोई तख्तापलट के ज़रिए सत्ता पर काबिज होने के मंसूबे बनाता दिखाई देता है।


इसी उपन्यास में कहीं देश के जांबाज़ सिपाही अपनी जान को जोख़िम में डाल देश के दुश्मनों का ख़ात्मा करते नज़र आते हैं तो कहीं कोई टीवी चैनल अपनी टी आर पी के चक्कर में पूरे मामले की बखिया उधेड़ता नज़र आता है। कहीं अपहरण का शक लोकल माफ़िया और अंडरवर्ल्ड से होता हुआ आतंकवादियों के ज़रिए पाकिस्तानी खुफ़िया एजेंसी आई.एस.आई की तरफ़ स्थान्तरित होता दिखाई देता है। तो कहीं किसी बड़ी कंपनी को हड़पने की साजिशों के तहत किसी की शह पर कंपनी के शेयरों को गिराने के लिए मंदड़ियों हावी होते दिखाई देते हैं। राजनीति उतार चढ़ाव से भरपूर एक ऐसी घुमावदार कहानी जो अपनी तेज़ रफ़्तार और पठनीयता भरी रोचकता के चलते पाठकों को कहीं सोचने समझने का मौका नहीं देती। 


कुछ एक जगहों पर प्रूफरीडिंग की कमियों के अतिरिक्त इस उपन्यास के शुरू और अंत के पृष्ठ मुझे बाइंडिंग से उखड़े हुए दिखाई दिए। इस ओर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। 


पेज नंबर 103 में लिखा दिखाई दिया कि..


'स्वर्ण भास्कर के प्रोग्राम में नीलेश के साथ एक दर्जन से ज़्यादा कर्मचारियों के अगवा होने के साथ डेढ़ हज़ार करोड़ की फ़िरौती की बात को भी बहुत तूल दिया गया था'


जबकि इससे पहले पेज नंबर 52, 68 और 90 पर इस रक़म को एक हज़ार करोड़ बताया गया है यानी कि फ़िरौती की रक़म में सीधे-सीधे 500 करोड़ का फ़र्क आ गया है। इसी बाद इसी बात को ले कर फ़िर विरोधाभास दिखाई दिया कि पेज नंबर 116 में अपहर्ताओं का आदमी मुंबई पुलिस कमिश्नर से एक हज़ार करोड़ रुपयों की फ़िरौती माँगते हुए उन्हें एक ईमेल भेजी होने की बाबत बताता है लेकिन अगली पेज पर फिर जब उस रक़म का जिक्र ईमेल में आया तो उसे एक हज़ार करोड़ से बढ़ा कर फ़िर से एक हज़ार पाँच सौ करोड़ रुपए कर दिया गया। हालांकि इस पेज पर इस बाबत सफ़ाई भी दी गयी है कि अपहर्ताओं ने माँग की शर्तों में बदलाव कर दिया लेकिन इस तरह की बातों ने बतौर पाठक मुझे थोड़ा सा कन्फ्यूज़ किया। 


साथ ही इस तेज़ रफ़्तार रोचक उपन्यास में एक बात और ख़ली कि फ़िरौती की रक़म भारतीय रुपयों में क्यों माँगी जा रही है? पाकिस्तानियों के सीधे-सीधे तो वो काम नहीं आने वाले। बेहतर होता कि फ़िरौती की रक़म को भारतीय रुपयों के बजाय किसी अंतरराष्ट्रीय करैंसी मसलन अमेरिकन डॉलर या फ़िर यूरो में माँगा जाता । 


हालांकि 279 पृष्ठीय यह बेहद रोचक उपन्यास मुझे लेखक की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इसके पेपरबैक संस्करण को छापा है सूरज पॉकेट बुक्स ने और इसका मूल्य रखा गया है 225/- रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

चौसर : जितेन्द्र नाथ


Thursday, June 22, 2023

Manoj Bajpayee : Ek Banda Kafi Hai

Film : Ek banda kafi hai
OTT Plateform : Zee5
Director: Apoorv Singh Karki
Writer: Deepak Kingrani
Producer: Vinod Bhanushali
                  Juhi Parkash Mehta


शुक्रिया मनोज वाजपेयी
आप सोच रहे होंगे कि मैं ऐसा क्यों लिख रहा हूँ? इसका कारण यह है कि आज के दौर में जब सब कुछ किसी न किसी एजेंडा की चाशनी/ज़हर में डूब चुका है, ऐसे वक्त में यह अभिनेता पूरे मनोयोग से हमें अपने प्रतिभा के दम पर चकित कर देता है। 
इरफ़ान भी ऐसे ही कलाकार थे पर उनका साथ अब उनके चाहने वालों से छूट गया है।
 मैं उनके बारे में ऐसा उनकी ओटीटी (Zee5) पर प्रदर्शित फिल्म 'एक बन्दा काफी है', देखने के बाद कह रहा हूँ।  दर्शकों को कहानी के बारे में पहले से ही अंदाजा होने के बावजूद मनोज अपने दम पर दर्शकों को बांधे रखने में पूरी तरह से कामयाब रहे हैं।
 मनोज वाजपेयी ने पूनम चन्द सोलंकी के किरदार में कई सारे चाँद टांक दिए हैं। यह सब उन्होंने इतने सहज अंदाज़ में किया है कि सब मन्त्रमुग्ध होकर उनकी अदाकारी को अनुभव करते हैं।
मनोज वाजपेयी ने एक मासूम लड़की की खातिर न्याय की तलाश में निकले एक आम वकील 'पीसी' सोलंकी की सारी कोशिशें, हताशा, डर, उम्मीदें और पीड़ा पर्दे पर साकार कर दी हैं। बहुत दिनों के बाद ऐसी कोई फ़िल्म देखी है जिसके बारे में सीन दर सीन बात की जा सकती है।
फ़िल्म के अंत में वह अपनी ज़िरह को जिस तकरीर से खत्म करते हैं, वह हर आदमी के उस रोष को प्रकट करती है, जो तथाकथित बाबाओं द्वारा उनकी आस्था में सेंध लगा कर धोखा देने के बाद उपजता है और लोग ठगा सा महसूस करते हैं। जब वकील सोलंकी कहता है कि 'यह आदमी भगवान नहीं... रावण है' तो उनके किरदार के मुंह से निकले ये शब्द रोंगटे खड़े कर देते हैं और भावुक कर देते हैं। उनके हाथों की कंपन उनकी ऊर्जा का ह्रास दिखाती है जो इस केस में लड़ने में लगी है। 
इस 'बन्दे' को अभिनय करते देखना एक तृप्ति प्रदान करता है जो कभी बलराज साहनी और संजीव कुमार को देख कर होती थी। 
इसलिये शुक्रिया मनोज वाजपेयी 💐💐
#jitendernath #manojbajpayee 
Manoj Bajpayee

Tuesday, August 2, 2022

शिकायत : एक नज़्म : जितेन्द्र नाथ

        शिकायत

वो मिल गया मुझे, जो मुझमें ही गुम था ।

शिकायत थी उसे, हम कभी मिले ही नहीं ।।


सच की राह में दुश्वारियों का सबको गिला रहा

जिन्हें शिकायत थी, वो उस पर कभी चले ही नहीं ।।


परवरदिगार को कोसते हैं वो ही चंद लोग

जो जिंदगी में उसकी राह में कभी चले ही नहीं ।।


मेरी गलतियों का उनके पास पूरा हिसाब था

जो जिन्दगी में मुझसे कभी मिले ही नहीं।।


बैठोगे तन्हाई में तो तुम्हें सब याद आएगा

मोहब्बत भी है दरमियाँ, सिर्फ गिले ही नहीं।।


🌺🌸❣️💐🌺🌸❣️💐🌺🌸💐

                © जितेंद्र नाथ



Sunday, March 6, 2022

यूक्रेन

वो मुझको तन्हा रोता मिला
हर इंसान उसे सोता मिला

मैंने पूछा कि कौन हो तुम
वो बोला तुम्हारा वजूद हूँ मैं

 तुम मिट जाओगे इस तरह
सिमट जाऊँगा मैं तुम्हारे बाद

क्यों बारूद से खेलते हो तुम 
मेरे पास इसका जवाब न था

मेरे वजूद ने एक सांस छोड़ी
मैं समझ गया तुम्हारा उत्तर

तुम पर तुम्हारा अहम हावी है
तुम मुझे मिटाना चाहते हो

पर ये हो सकता है संभव तब
जब मिट जाओ तुम मुझसे पहले
  © जितेन्द्र नाथ 06/03/2022



Thursday, January 27, 2022

वो ही बताएगा

वो ही बताएगा: नज़्म

मुझे कब क्या है सुनना ये वो ही बताएगा
सच उसमें हो कितना, ये वो ही बताएगा

मैं कितना अकलमंद हूँ मैं ये भूल ही गया
मुझमें दिमाग है कितना, ये वो ही बताएगा

सुबह से शाम तक जो दिखे वो देखते रहो
किसमें है फायदा कितना, ये वो ही बताएगा

कुछ गलत अगर लगे तो तुम बोलना नहीं
बोले वो गद्दार है कितना, ये वो ही बताएगा

ये पागलों का हुजूम क्यों सड़कों पे आ गया
दर्द में बोलना है कितना, ये वो ही बताएगा

सुर में सुर मिला सको तभी बोलना सनम
तेरा है ये दरबार कितना, ये वो ही बताएगा

किस बात पर होगी बात ये तुझे क्या पता
बोलेगा पर कौन कितना, ये वो ही बताएगा
  © जितेन्द्र नाथ

सफ़र: एक नज़्म

आह का असर होता नहीं, ये दर्द इस कदर हद से गुजरा है। परछाई भी मुझे छू न पाए, वो इस तरह मेरे पास से गुजरा है।। इक तबस्सुम आई थी उसके होठों पर ...