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Saturday, November 25, 2023

The Railway Men: Poetry of Pain

द रेलवे मैन :  सत्य घटनाओं पर आधारित दारुण कथा
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भारत में वेब सीरीज की जमीन गाली गलौज की दुनिया से आगे बढ़ कर अपने लिए एक पुख्ता जमीन तलाश करने में सक्षम हो गई है। 'द रेलवे मैन' इस बात का सुंदर उदाहरण है। किसी अपराधिक पृष्ठभूमि के गुनाहगारों को 'लार्जर देन लाइफ' साबित करने वाली कहानियों के अलावा भी कुछ बनाया जा सकता है, यह इस सीरीज ने साबित कर दिया है।
भोपाल गैस त्रासदी की दारुण त्रासदी पर एक धाराप्रवाह करुणामयी कविता की तरह चलती है इस सीरीज की कहानी। The Railway Men में दिखाया गया है कि कुछ कंपनियां अपने लालच के लिए किस तरह से आम इंसानों को मौत के दावानल में धकेल देती हैं। इस सीरीज में  लगभग सभी कलाकारों का काम बेहतरीन है।
 शुरुआती एपिसोड में दिव्येन्दु भट्टाचार्य है जो कमरुद्दीन की भूमिका में है। मैंने यह अभिनेता जामताड़ा सीरियल में काम करते हुए पहली बार महसूस किया। देखा तो उन्हें शायद पहले भी हो सकता है पर जहन में उस सीरियल के बाद अटके। उनका अभिनय इस सीरीज की जानदार शरुआत करता है।
बाबिल खान, जो इरफान के पुत्र हैं, का अभिनय की दुनिया में यह पहला कदम है। इस सीरीज में उनका पहला सीन कौन सा शूट हुआ होगा, इस बात का हमें पता नहीं लेकिन शुरुआती सीन में अपरिपक्वता झलकती है। शायद इसका कारण यह भी हो सकता है कि मैंने शुरू में उनमें इरफान को ढूंढने की कोशिश की हो। बाबिल को इस चीज का मुकाबला करना होगा। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, बाबिल खान अपने आप को बड़ी खूबसूरती से इमाद के किरदार में ढाल लेते हैं। इमाद के एक डॉयलोग में जब वह कहते हैं कि 'यह मेरी बस्ती है... तो ऐसा लगता है कि जैसे वो माया नगरी में अपने आने का एलान कर रहे हों। मुझे संजय खान के बनाये सीरियल 'ग्रेट मराठा' में इरफान का एक सीन याद आता है जिसमें इरफान (ग़ुलाम कादिर- अहमद शाह अब्दाली का सेनापति) और मुकेश खन्ना (इब्राहिम खान गार्दी- मराठों का तोपची) आमने सामने होते हैं। मुकेश खन्ना उस वक्त अपनी लाउड एक्टिंग से सामने वाले अभिनेता पर हावी हो जाते थे। उस सीन में भी मुकेश खन्ना के बड़े अच्छे लिखे डायलॉग हैं जो दर्शकों को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त थे पर जब उनके डायलॉग खत्म होते हैं तो छरहरे शरीर पर सेनापति का भारी भरकम लबादा पहने, उकताए हुए, सिर्फ इतना कहते हैं... इसे तोप से उड़ा दो। उस डायलॉग में कोई खास कारीगरी नहीं थी पर एक अभिनय के कारीगर ने उसे इतनी बारीकी से बोला था जिसमें सब कुछ था... गुस्सा, खीज और क्रूरता। उम्मीद है कि बाबिल इस अभिनय की बस्ती को अपनी दुनिया बनाएंगे और लंबे समय तक टिकेंगे।
द रेलवे मैन : के के मेनन/आर माधवन/दिव्येन्दु (2) 
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अगर कहानी में जान हो तो ठीक ठाक अभिनेता भी काम चला जाते हैं और एक अच्छा अभिनेता/अभिनेत्री औसत कहानी का स्तर उठा देते हैं। अगर कहानी भी कसी हुई हो और उसमें के के मेनन, आर माधवन और दिव्येन्दु जैसे धरती-पकड़ अभिनेता काम कर रहे हों तो जो नतीजा सामने आता है वह है 'रेलवे मैन'। 
'रेलवे मैन' की कहानी भारतीय जनमानस में गहरे पैठी हुई भोपाल गैस कांड की जन-त्रासदी के इर्द-गिर्द घूमती है और इसी घटना का एक अहम किरदार बन जाता है भोपाल का रेलवे स्टेशन।
रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर की भूमिका के के मेनन ने निभाई है। यह अभिनेता अब अभिनय की पाठशाला बन गया है। वे अपने जीवन की एक विफलता की आत्मग्लानि से ग्रसित एक कर्त्तव्य परायण स्टेशन मास्टर इफ्तिखार सिद्दीकी की भूमिका की आत्मा में बहुत गहरे तक उतर गए हैं। उनकी बेबसी, बेचैनी, दुख और त्रासदी में लोगों को बचाने में विफलता के सारे भाव  दर्शकों तक बखूबी पहुंचते हैं। शुरुआत में अपने स्टेशन की संचार-तंत्र को ठीक करवाने के लिए जूझते हुए स्टेशन मास्टर इफ्तिखार सिद्दीकी को आगे चलकर जिंदगी और मौत के बीच संवाद कायम करना पड़ता है। के के मेनन ने लाचार व्यवस्था के बीच अपने साधनों को साधने की  अदाकारी को जीवंत कर दिया है। यूँ तो पूरा किरदार ही बहुआयामी है लेकिन कुछ सीन लाजवाब बन पड़े हैं। एक सीन है जिसमें वह आने वाली ट्रेन को रोकने की सूचना देना चाहते हैं लेकिन टेलीफोन काम नहीं कर रहा है। इस सीन में उनकी बेचारगी देखते ही बनती है। अंतिम सीन में जहां वे मुर्दा लोगों के बीच एक लाश के रूप में पड़े हुए हैं लेकिन अंतिम संस्कार से पहले उनके जीवन की ज्योति फिर टिमटिमा उठती है और वे बदहवासी में फिर से लोगों को बचाने की गुहार लगाते हैं। यह सीन अगर कोई दूसरा अभिनेता करता तो एक ट्रैजिक तो एक ट्रैजिक सीन कॉमेडी सीन में परिवर्तित हो सकता था लेकिन यह केके मेनन की ही महारत है कि वे अपने दर्शकों को इस दारुण दृश्य में शामिल कर लेते हैं और दर्शक भी सामने जलती हुई चिताओं को देखकर शोक संतृप्त हो जाते हैं। मनोज बाजपेई ही यह कैसे सक्षम अभिनेता थे जो इसे इतनी ही शिद्दत से निभाने में सक्षम है। यदि कभी भविष्य में अभिनय की बात की जाएगी तो अवश्य ही यह सीन बलराज साहनी, संजीव कुमार, और पंकज कपूर जैसा अभीनेताओं के उदाहरण के साथ उद्धरित किया जा सकेगा
दिव्येन्दु यहां पर बलवंत यादव नामक लुटेरे की भूमिका में है जो स्टेशन की तिजोरी से करोड़ों रुपए लूटने की फिराक में है लेकिन कॉन्स्टेबल की वर्दी पहने वह इफ्तिखार सिद्दीकी के साथ लोगों को बचाने की मुहिम में न चाहते हुए भी शामिल हो जाता है। एक चोर के भीतर चलते हुए लालच और इंसानियत के द्वंद्व को उन्होंने बखूबी साकार किया है। मिर्ज़ापुर से चर्चित हुआ यह अभिनेता यकीनन एक मंझे हुए एक्टर में परिवर्तित हो चुका है।
आर माधवन एक लवर बॉय से एक शानदार गरिमामय अभिनेता में ढल चुके हैं। यहाँ पर उनका किरदार बहुआयामी तो नहीं है पर एक व्यवस्था को नकार कर अपना धर्म निभाने वाले जी एम की भूमिका में वह जमे हैं।
यश चोपड़ा की धरोहर संभाले हुए आदित्य चोपड़ा और उदय चोपड़ा की सारगर्भित प्रस्तुति को निर्देशक शिव रवैल ने बड़ी खूबसूरत अंदाज़ में भोपाल को ओटीटी के पर्दे पर साकार कर दिया है।
कुछ अच्छा देखना चाहते हैं तो रेलवे मैन एक बढ़िया चुनाव रहेगा।

सफ़र: एक नज़्म

आह का असर होता नहीं, ये दर्द इस कदर हद से गुजरा है। परछाई भी मुझे छू न पाए, वो इस तरह मेरे पास से गुजरा है।। इक तबस्सुम आई थी उसके होठों पर ...